पुष्करणा भारतीय हिंदू ब्राह्मण समुदाय है।

पुष्करणा ब्राहम्णों के चौदह गोत्र और चौरासी जातियां (1)उतथ्य गोत्री, ऋगर्वेदी, आश्वलायनसूत्री 1.बाहेती 2.मेडतवाल 3.कॅपलिया 4.वाछड़ 5.पुछतोड़ा 6.पाण्डेय

(2) भारद्वाज गोत्री, यर्जुर्वेेदी, कात्यायन सूत्री 7.टंकाशाली (व्यास) 8. काकरेचाा 9.माथुर 10.कपटा (बोहरा) 11. चुल्लड़ 12. आचार्य

(3) शाण्डिल्य गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 13. बोघा (पुरोहित) 14. मुच्चन(मज्जा) 15. हेडाऊ 16. कादा 17. किरता 18.नबला

(4) गौतम गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 19. केवलिया 20.त्रिवाडी (जोशी) 21.माधू 22.गोदा 23.गोदाना 24.गौतमा

(5) उपमन्यु गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 25.ठक्कुर(उषाघिया) 26.बहल 27.दोढ़ 28.बटृ 29.मातमा 30.बुज्झड़

(6) कपिल गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 31.कापिस्थलिया(छंगाणी) 32.कोलाणी 33.झड़ 34.मोला 35.गण्ढडिया(जोशी) 36.ढाकी

(7) गविष्ठिर गोत्री, सामवेदी, कात्यायन सूत्री 37.दगड़ा 38.पैढ़ा 39.रामा 40.प्रमणेचा 41.जीवणेचा 42.लापसिया

(8) पारासर गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 43.चोबटिया(जोशी) 44.हर्ष 45.पणिया 46.ओझा 47.विज्झ 48.झुण्ड

(9) काश्यप गोत्री, सामवेदी, लाट््यायन सूत्री 49.बोड़ा (bora) 50.लोढ़ा(नागूं) 51.मुमटिया 52.लुद्र(कल्ला) 53.काई 54. कर्मणा

(10) हारित गोत्री, [[सामवेदी]], लाट्यायन सूत्री 55.रंगा 56.रामदेव थानवी मूता 57.उपाध्याय 58.अच्छु 59.शेषधार 60.ताक(मूता)

(11) शुनक गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 61.विशा 62.विग्गाई 63.विड़ड् 64.टंेटर 65.रत्ता 66.बिल्ला

(12) वत्स गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 67.मत्तड ़ 68.मुडढर 69.पडिहार 70.मच्छर 71.टिहुसिया(जोशी) 72.सोमनाथा

(13) कुशिक गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 73.कबडिया 74. किरायत 75.व्यासड़ा 76.चूरा 77.बास 78.किराडू (14) मुद्गल गोत्री, अथर्ववेदी, शांखायन सूत्री 79.गोटा 80.सिह 81.गोदाणा 82. खाखड़ 83.खीशा 84.खूहार


पुष्करणा ब्राह्मणों का मूल स्थान और विस्तार

ब्राह्मणों का मूल स्थान और विस्तार दीनदयाल ओझा पिछले कई वर्षों से पुष्करणा ब्राह्मण का उत्स और उनके विकास क्रम का इतिहास कई विद्वानों के गहन अध्ययन का विषय रहा है। पुष्करणा ब्राह्मण विभिन्न ब्राह्मण समुदाय में से कब पृथक रूप से संबोधित किए जाने लगे, वे कहां-कहां प्रारम्भ में रहे, कब-कब विजय-पराजय का सामना करते हुए अपने नाम से नगर बसाते-छोड़ते किन-किन स्थानों पर निवास करते विश्व में कोने-कोने में फैल गए थे और इस तरह के अन्यान्य प्रश्न अनुसंधेय है। पिछले वर्षों में जो कुछ जानकारियां सामने आई हैं, उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में ब्राह्मणों के दो वर्ग ‘गौड़’ और ‘द्रविड़’ नाम से प्रख्यात हुए। गौड़ देशी ब्राह्मण बौड़ और ‘द्रविड़’ क्षेत्रीय ‘द्राविड़’ कहलाने लगे। दोनों कुलों के पांच-पांच कुल और विकसित हुए जो ‘पंच-गौड’ और ‘पंच-द्राविड़’ कहलाए। पचं गौड़ के नाम है- सारस्वत,कान्यकुब्ज, गौड, उत्कल, और मैथिल। इसी प्रकार पंच द्राविड़ के कर्नाटक, तेलंग, महाराष्ट्र, द्राविड़ और गुर्जर विख्यात हुए। ऐसी मान्यता है कि इन दसों कुलों के कालान्तर में चौरासी भेद हुए। पंच द्राविड़ कुल की गर्जुर शखा के भी चौरासी भेद इसी क्रम में माने जाते हैं आज भी ‘गुर्जर’ के चौरासी भेद गुजरात अंचल में ब्राह्मणों के सामूहिक भोजन को चौरासी नाम से संबोधित किया जाता है। पुष्करणा, गुर्जर ब्राह्मणों की शाखा है। उपलब्ध निष्कर्षों का सार-रूप से सिंहावलोकन किया जाय तो ऐसा लक्षित होता है कि- 1. श्रीयुत प. पण्डोवा गोपालजी रचित ‘जाति विषयक पुस्तक में स्पष्ट लिखते हैं कि पुष्करणे ब्राह्मण गुर्जर ब्राह्मणों के चौरासी भेदों में छठा भेद है। 2. श्रीयुत रेवरेन्ड शेरिंग एम.एल.एल.बी. ने ‘हिन्दू कास्टम्’ ग्रंथ मंे भी पुष्करणा ब्राह्मणों को पंच-द्राविड़ों की गुर्जरों शाखा का अंग लिखा है। 3. भारत की जनगणना की पच्चीसवीं जिल्द के अन्तर्गत राजपूताना क्षेत्र की रिपोर्ट में भी पुष्करणा ब्राह्मणों को गुर्जर ब्राह्मणों की ही शाखा माना है। 4. सर्वश्री पं. व्यास मोतीलालजी शर्मा और पं.पणिया श्री गोवर्द्धनजी भी इस तथ्य को पुष्करणा समाज की ऐतिहासिकता नाम के लेख में, जो पुष्करणा सज्जन चरित्र के पृष्ठ 231 से 270 पर मुद्रित है, स्वीकारते हैं कि पुष्करणे ब्राह्मण गुर्जर ब्राह्मणों के चौरासी भेदों में से एक भेद हैं। पुष्करणा नामकरण अगर ऐसा मान लिया जाए कि पुष्करणा ब्राह्मण पंच द्राविड़ गुर्जर ब्राह्मणों की एक शाखा है, तब प्रश्न उठता है कि यह शाखा पुष्करणा नाम से स्वतंत्र रूप से कब संबोधित की जाने लगी ? इसी प्रश्न के उत्तर में अनेकानेक पौराणिक और ऐतीह्य आख्यायन प्रचलित हैं उन समस्त आख्यानों में से कतिपय आख्यान यहां प्रस्तुत किये जा रहे है। पुष्कर नामक बालक के नाम से पुष्करणा भारत में पुरुषों के नाम से वंश और नगरों के नाम चलने की प्राचीन परम्परा रही है। सर्वश्री व्यासजी और पणियाजी लिखते हैं कि ‘ब्राह्मण पुराण में लिखा है चतुरानन-सुत भृगुजी के तीन पुत्र हुए च्वयन, शना और गर्जुर। गुर्जर बड़े प्रभावशाली हुए। इन्होंने गुराजत को वासस्थान बनाया। इसके पांच पुत्र हुए। उनमें तृतीय पुत्र ‘ऋचीक’ अतुल प्रभावशाली हुआ। इनका विवाह माण्डव्य नामक ब्रह्म ऋषि की सुकन्या पुष्पावली से हुआ। ये दम्पति उत्तम रीति से जीवन निर्वाह करने लगे। इनकी ओर से ‘पुष्कर’ नाम का बालक हुआ। यह एक व्रतधर और प्रत्युत्पन्नमति हुआं इन्होंने अपना वासस्थान सिंधु नदी के तट पर नियत किया। कुछ समय पश्चात् एक ग्राम बसाया जो इनके नामानुसा प्रसिद्ध हुआ और इनकी सन्तान ‘पुष्करणा’’ कहलाने लगी। पोकरन के आधार पर पुष्करणा श्री भट्टाचार्य का मत ‘हिन्दू जाति और मत’ नामक ग्रंथ के प्रणेता श्री युत पं. योगेन्द्र नाथ भट्टाचार्य एम.ए.डी.एल. पृ.सं. 66 पर लिखते है कि ‘पुष्करणा ब्राह्मणों की संख्या केवल राजपूताने में ही अधिक नहीं है, किन्तु गुजरात और सिंध में भी बहुत है। इनका पोकरना यह नाम जोधपुर और जैसलमेर के मध्य पुष्कर सेवक है। पुष्करणा ब्राह्मण का सम्बन्ध अजमेर क समीप पुष्कर क्षेत्र से बिल्कुल नहीं है। उक्त मत की पुष्टि करते हुए श्री व्यासजी एवं श्री पणियाजी पु.स. चरित्र के पृष्ठ सं. 268 में लिखते हैं कि इन ऐतिहासिक प्रमाणों से प्रमाणित होता है कि सैंधवारण्यवासी ब्राह्मण जाति की पुष्करणा (पोकरन) संज्ञा ‘पुष्करणा’’ पोकरन ग्राम से ही प्रसिद्ध हुई। जो पदार्थ जहां पर उत्पन्न होता है, उसका बाहुल्य वहीं पर ही अधिक रहता है। आज भी यदि अवलोकन किया जाय तो गुजरात, सिंध और पोकरन के निकटवर्ती ग्रामों तथा नगरों में पुष्करणा जाति के अधिक से अधिक घर विद्यमान है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि श्री स्कंदपुराण परिशिष्ट श्रीमाल महात्म्य सारे पुष्करणोपाख्यान के अन्तर्गत जिस रूप में ‘पुष्करणा’ जाति का उद्भव माना गया है, वह युक्तिसंगत प्रतीत होता है। जहां तक पोकरन का पुष्करणों से संबंध का प्रश्न है। ऐसा लगता है कि पुष्करणों की संख्या यहां निवास करने से यह क्षेत्र पोकरन कहलाया है न कि पोकरन में निवास करने के कारण पुष्करणा। पुष्करणा और श्रीमाली ब्राह्मण सैंधवारण्य के ब्राह्मणों को प्रसन्न करके लक्ष्मी ने कहा, जो श्रीमाल में रहे है, वे ‘श्रीमाली’ कहे जायेंगे ‘श्रीमाले वस्थिता ये हीश्रीमालाख्या भविष्यथ।’ (श्लोक सं. 215) अर्थात् अन्य जो सैंधवारण्य के ब्राह्मण हैं वे पुष्करणा कहलायेंगे। सैंधवारण्य मूल प्राचीनतम निवास उक्त तथ्य से ऐसा प्रतीत होता है कि सैंधवारण्य पुष्करणा ब्राह्मणों का मूल प्राचीनतम निवास रहा। श्री व्यासजी और श्री पणियाजी भी मुहणोत नेणसी की ख्यात के द्वितीय भाग के उद्वरण का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि पुष्करणे ब्राह्मण प्राचीन काल में सैंधवारण्य में निवास करते थे। सैंधवारण्य का क्षेत्रा यद्यपि सुनिश्चित रूप से सैंधवारण्य का क्षेत्र तो नहीं बताया जा सकता, पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अरण्य की सीमा अत्यधिक विस्तृतथी। समूचा सिंधू का तट और इसके चतुर्दिक बंदरगाह आदिइसकी सीमा के अन्तर्गत आते रहे होंगे। आज का गुजरात, सिंध, जैसलकेर, बाड़मेर, इसी सैंधवारण्य का भाग रहा होगा। सिंध का देवल नामक बन्दरग्राह और पुष्करणा हिन्दू राजा दाहिर भारत के इतिहास में ऐसा सुमान्य है कि खलीफा वलीदके शासन के शासन काल में अरबों ने पूरी लगन से भारत की ओर अपनी सेना बढ़ाई। कारण यह बना कि एक अरब जहाज पकड़ सिंध के दैबुल (देवल) नामक बंदरगाह में पकड़ लिया गया। सिंध में हिन्दू राजा दाहिर से उसे लौटने की मांग की, उसने यह कहकर कि देवल उसके अधिकार मं नहीं है, इस मांग को मानने से इन्कार कर दिया। राउवर (रावड़), आलोर और ब्राह्मणवाद पर आक्रमण ‘‘भारत पर अरबों का आक्रमण’’ अथवा ‘अरबों की सिंध विजय’ संबंधी इतिहास का अवलोकन करने से ऐसा प्रतीत होता है कि 712 ई. में राउर (रावड़), आलोर ओर ब्राह्मणवाद नाम के सुदृढ़ और सुविख्यात नगर थे। पुष्करणा ब्राह्मण हिन्दू राजा दाहिर के देवल बंदरगाह पर पकड़े जहाज को न देने का उत्तर और दैबुल (देवल) मेरे अधिकार में नहीं है, को सुनकर अरब बड़े रुष्ट हुए और चालदी (मेसोपोटामिया) शासक उलहज्जा ने अपने चचेरेभाई मुहम्मद-इब्न-कासिम के सेनापतित्व में 712 ई. में दैबुल पर आक्रमण के लिये सेना भेजी। दैबुल पर कासिम ने विजय प्राप्त की वहाँ कत्ले आम किया। दैबुल ( देवल) पर विजय प्राप्त करके कासिम की सेना सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर पहुंची और रावर नाम स्थान पर उसने नदी पार की। रावर का राजा दाहिर पुष्करणा ब्राह्मण था और कासिम को दाहिर की हिन्दु सेना से सामना करना पड़ा। यद्यपि दाहिर वीरता पूर्वक लड़ा परन्तु इस युद्ध में वह विजयी नहीं रहा और वह युद्ध में ही मारा गया। आलोउ उस समय दाहिर की राजधानी थी। दाहिर की वीर धर्मपत्नी रानीबाई ने आलोर की तब तक रक्षा की जब तक कि युद्ध सामग्री पूर्ण रूप से समाप्त न हो गई। भारतीय नारियों की परम्परानुसार उसने कलंकित होने की अपेक्षा जौहर किया। कई इतिहासकार ऐसा भी मानते हैं कि दाहिर की धर्मपत्नी ने राउर या रावड़ किले की रक्षा करते वहीं जौहर किया था। आलोर और रावर या रावड़ पर विजय प्राप्त करके कासिम की सेना मुल्तान की राह मंे आने वाले ‘ब्राह्मणवाद’ की ओर बढ़ी। ब्राह्मणवाद को विजय करके कासिम मुल्तान की ओर बढ़ा यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ‘ब्राह्मणवाद’ में दाहिर का बड़ा पुत्र जय सिंह लड़ते-लड़ते मारा गया। ब्राह्मण राजा दाहिर की पराजय इस प्रकार ब्राह्मण राजा दाहिर, उसकी रानी रानीबाई और बड़े पुत्र जयसिंह तथा छोटा पुत्र आलोर का रक्षक जब अरबों के युद्ध में मारे गये तब दाहिर की दोनो पुत्रियों को अरबों ने किसी तरह अपने कब्जे में कर लिया। दोनों पुत्रियों द्वारा कासिम का बदला लेना अरब इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि कासिम ने जब दाहिर की दोनों पुत्रियों को खलीफा के हरम में भेज दिया तब दोनों ने खलीफा के सम्मुख यह आरोप लगाया कि कासिम ने हमे आपके हरम में भेजने से पूर्व बेइज्जत किया था। खलीफा यह सुनकर बड़ा क्रोधित हुआ और उसने आज्ञा दी की कासिम को गाय की खल में जीवित सिलाई कर उसकी हालत में दमिश्क भेज दिया जाय। दोनों पराक्रमणी साहसी और सतीत्व की रक्षा करने वाली इन पुत्रियों ने अपने प्राणोत्सर्ग करने से पूर्व खलीफा को स्पष्ट बतला दिया कि हमने अपने माता-पिता और परिवार का नाश करने वाले कासिम से बदला लेने की भावना से ही यह सब कुछ किया था। सिन्ध से ब्राह्मणों का पलायन सिंध का ब्राह्मण राजा दाहिर जब मारा गया और सिंध पर पूर्ण रूप से मुहम्मद-इब्न-कासिम का शासन हो गया (ईस्वी सन् 715) तब ब्राह्मणों ने अपने धर्म, कुल और संस्कृति की रक्षा हेतु इस अंचल से पलायन किया। अरबों पर सिंध आक्रमण के इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि जिन्होंने आत्मसमर्पण करके धर्म परिवर्तन कर लिया, उनको कासिम ने समस्त सुविधाएँ दी, परन्तु जो आत्मसमर्पण के लिये तैयार नहीं हुए और न जिन्होंने धर्म परिवर्तन ही किया, उन्हें अत्यधिक यातनाएँ दी गई। फलस्वरूप ऐसा लगता है कि या तो युद्ध के तुरन्त बाद या स्वल्पकाल पश्चात् कई स्वाभिमानी ब्राह्मण अन्य अंचलों में अपनी जान और कुल तथा ब्राह्मणत्व एवं ब्राह्मण संस्कृति की रक्षार्थ चले गये। ऐसा भी संभव है कि कई ब्राह्मणों ने सिंध क्षेत्र में रहते हुए भी चुपचाप छिप कर अथवा गुप्तरूप से वहीं रहते हुए ब्राह्मत्व की रक्षा की हो। पुष्करणा ब्राह्मणों का जैसलमेर क्षेत्रा में आगमन पूर्व उल्लेख से यह स्पष्ट है कि सैंधवारण्य के ब्राह्मण भीनमाल में लक्ष्मी द्वारा पुष्करणों से सम्बोधित हो पुनः सैंधवारण्य चले आये। जो लोग श्रीमाल में रहे वे ‘श्रीमाली’ ब्राह्मण कहलाये। इन्हीं पुष्करणा ब्राह्मणों ने दाहिर राजा हुआ। इन्हीं बाह्मणों ने सैंधवारण्य में संभवतः ब्राह्मणवाद नगर बसाया, जिस पर कासिम ने विजय प्राप्त की। इसके पश्चात् पुष्करणा ब्राह्मण सिंधु नदी के दक्षिणी ढलान अथवा ब्राह्मणवाद या मुल्तान के दक्षिण भाग में जैसलमेर की सीमा लगती है। अरबों ने इस रेगिस्तान की ओर नहीं देखा क्योंकि आमदनी की दृष्टि से यह क्षेत्र सिंध को छूती है। उस समय ‘तन्नोट’ आदि अच्छे और सुमृद्ध क्षेत्र थे। ओर महारावल तन्न अच्छे देवी भक्त और ब्राह्मणों का सम्मान करने वाले थे। तन्नोट रहीमयारखां के ठीक दक्षिण में है। यहां से ब्राह्मण इस रेगिस्तानी अंचलर के देरावर, लोद्रवा, कोइला, जैसलमेर, पोकरन आदि-आदि अंचलों में फेलते गये और पूर्व में रहने वाले पुष्करणा ब्राह्मण बंधुओं से आ मिले। इसका पूर्ण विवरणअ श्रतर साक्ष्यों के आधार पर उपलब्ध होता है। मात्र वि.सं. 868 में बोधा नख के श्री देवायतजी ने भाटी कुल में राजवंशावली रावल दवराज की रक्षा की। इन्होंने ही देवायतजी को पुरोहित उपाधि से विभूषित करके कुलगुरु बनाया। सर्वश्री व्यासजी और पणियाजी के अनुसार देवायतजी की एक कन्या थी, जो चोहटिया जोशी रणकजी को ब्याही गई। इनके पुत्र सज्जोजी हुए जो रतनू की सन्तान चारण जाति के कुलगुरु नियत हुए। देवायतजी के हेमराज, धांवल, दशरथ, लाल, खालू, वीरपाल और रतनू नाम से सात पुत्र थे। द्वितीय पुत्र धावलजी से वंश की बहुत अधिक वृद्धि हुई (पु.सं. चरित्रः पुं.सं. 41)। इस उल्लेख से यह भी स्पष्ट प्रभावित होता है वि.सं. 868 के आस-पास चोहटिया जोशी भी विद्यमान थे और बोधा (पुरोहित) तथा चोहटया (जोशी) जाति में विवाह सम्बन्ध था। पुष्करणों का इतिहास ग्रंथ के पृष्ठ 16 पर यह भी लिखा मिलता है कि ‘‘वर्तमान में व्यास कहलाने वाले पुष्करणा ब्राह्मणों की मूल जाति टंकशाली हैं। वि.सं. 662 में लोद्रवा के भाटी राजा मुन्ध ने श्री लल्लूजी टंकशाली को अपना गुरु बनाकर व्यास पदवी से विभूषित किया तब से श्री लल्लूजी की सन्तान व्यास कहलाने लगी और आज तक इसी नाम से विख्यात है। इन्हीं श्री लल्लूजी ने वि.सं. 996 में लुद्रवानगर में ‘लक्ष-मोज’ नामक महाविष्णु यज्ञ कर दूर-दूर के पुष्करणा बन्धुओं को निमंत्रित किया। उनको कई दिन भोजन कराने के पश्चात् मार्ग व्यय और दक्षिणा से संतुष्ट कर बिदा किया। यद्यपि भाटी वंश के प्रत्येक राजा के संग राजगुरु अवश्य रहा होगा, परन्तु उन राजगुरु पुरोहितों और अन्यान्य पुष्करणों का इतिहास अनुसंधेय है। तत्पश्चात् हम वि.सं. 1292 में महर्षि ईसाल पुष्करणा ब्राह्मण का उल्लेख पाते हैं, जिसने महारावल जैसल को जैसलमेर का किला बनवाने का स्थान बताया था। उस समय महर्षि ईसाल पुष्करणा ब्राह्मण की आयु 140 वर्ष की थी। (मु.नै ख्यात पृ.सं. 35)। दाहिर से पूर्व पुष्करणा ब्राह्मणों का निवास स्थान ‘काहला’ यहां यह उल्लेखनीय है कि तन्नोट, देरावर और लोद्राव आदि तो ब्राह्मणों के आवास रहे ही, परन्तु लोद्रवे के पास ‘काला’ अथवा ‘काहला’, ओझाओं, गज्जों-बिस्सों और पुरोहितों का प्रमुख निवास स्थान मुसलमानों के आक्रमण से पूर्व का भी रहा। इन पंक्तियों का लेखक स्वयं ‘‘काले या काहलेवाला ओझा’’ कहलाता है। सर्वश्री व्यासजी और पणियाजी ने श्रीयुत महाराज दीपचन्दजी टी.ओझा का परिचय देते हुए लिखा है ‘‘आपके पूर्वजों का उद्गम स्थान जैसलमेर राज्य के अन्तर्गत ‘काला’ नामक ग्राम हैं। एक उल्ल्ेख ऐसा भी मिलता है कि वि.सं. 531 में लौहार के भाटी राजा सोमनराव का विवाह लुद्रवा के पंवार राजा वीर सिंह की कन्या से हुआ। उस समय वीर सिंह ने अपने कुलगुरु आचार्य जाति के पुष्करणा ब्राह्मणों को जैसलमेर से पश्चिम की ओर पांच कोस (दस मील) दूर काहिला (काला) नामक ग्राम प्रदान करके ताम्रपत्र कर दिया। कालान्तर में उक्त ‘काहला’ ग्राम आचार्यों ने अपने सवासने ‘गज्जा पुरोहितों’ को सकल्प कर दिया। वि.सं. 615 में देवराज भाटी ने लुद्रवा राज्य पवारों से छीन लिया, तब से ही इस भू-भाग पर भाटियों का शासन एकीकरण से पूर्व तक चलता रहा है। किन्तु पंवारों द्वारा दिये गये गांव को भाटी राजा-महाराजा भी उसी प्रकार शासन गांव मानते रहे। इस प्रकार काहिला गांव तक (जांगीर पुर्नगठन तक) गज्जा पुरोहित परिवार के पुष्करणे ब्राह्मणों के अधीन रहा (जैसलमेर की तवारीख पृष्ठ 136 परगने जैसलमेर के गांव संख्या 52वें की केफियत)। आज भी श्री उद्ववदासजी गज्जा यहां निवास करते है। आज ब्राह्मणों की अधिक आबादी कहां है, इसका पुष्करणा ब्राह्मणोत्पत्ति नामक ग्रंथ में पं. रामकर्णजी ने लिखा है कि पुष्करणा ब्राह्मणों का बड़ा समुदाय मारवाड़ देश के नगरो ंमें है जैसे- जोधपुर, पाली, बीकानेर, फलोदी, पोहकरण, मेड़ता, नागौर और जैसलमेर, सिंध देश के नगरों मं करांची, नगरठठा, हैदराबाद, शिकारपुर, श्याहबंदर, सेवाण, जूण, बदीना, रोडीशक्खर, टंडा, नशरपुर और भावलपुर तथा मुलतान पर्यन्त और पंजाब में भी लाहौर, डेरा इस्माइलखां तक बसते हैं। ऐसे ही थल के मुल्कों में भी मिट्टी, उमरकोट और छाछरा तथा चेलार में भी बसते हैं। कच्छ झलार तथा खानदेश में धरणगांव, वेजापुर और गुजरात में पाटण, अहमदाबाद, बड़ौदा और सुरत में भी बसते हैं। इससे भी ऐसा स्पष्ट होता है कि गुर्जर, सिंध, लोद्रावा, काहला, पोकरन, फलोदी, जोधपुर, बीकानेर आदि क्रम से प्राचीनतम निवास स्थान रहे। 15वीं शताब्दी के पश्चात् कई महान् व्यक्ति जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़ आदि-आदि राजाओं के अग्रह पर तत्कालीन राजाओं के पास उन्नति-सम्मान के साथ उच्च पदों पर रहे अथवा अनेक विभिन्न कार्यों में संलग्न हो उनके राज्य में निवास करते रहे। समस्त सुख-सुविधाओं का उपयोग करते उन महानुभावों के अपने-अपने निवास स्थानों में ही वंश वृद्धि हुई और वहीं के कहलाने लगे। इस आशय का विस्तृत विवरण पुष्करणा सज्जन चरित्र में सर्वश्री व्यासजी एवं पणियाजी ने किया है और इतिहास ग्रंथों में भी विभिन्न इतिहासकारों द्वारा भी विर्णित हुआ है।